कुपोषण से बचने के लिए सबसे कारगर तरीका है …मोटा अनाज खाओ, कुपोषण दूर भगाओ….

कुपोषित आबादी की मुश्किल चुनौती से निपटने के लिए सबसे कारगर तरीका है मोटे अनाजों का सेवन।

हरित क्रांति से पहले यही अनाज जीवन आधार हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ ये चलन से बाहर हो चुके हैं। कभी हमारे आहार का जरूरी हिस्सा रहे ये मोटे अनाज आज उपेक्षित हैं। हमारे पुरखे इन्हीं अनाजों का सेवन करके सर्दी, गर्मी और बरसात से बेपरवाह रहते थे। पौष्टिकता की खान इन अनाजों को अन्य फसलों की तुलना में बहुत कम लागत में पैदा किया जा सकता है। एक से सात सितंबर तक चलने वाले राष्ट्रीय सुपोषण सप्ताह के तहत आज पेश तीसरी किस्त में इन्हीं अनाजों की महिमा को बताया जा रहा है।

मोटा अनाज : घास कुल (ग्रैमिनी) के पौधे जिनको उनके बीज के लिए उगाया जाता है। अनाज कहलाते हैं। एक परिवक्व अनाज के दाने के तीन भाग होते हैं। भ्रूण या जर्म, स्टार्च युक्त इंडोस्पर्म और पेरी कार्प या वाह्य आवरण। कुछ अनाज के दानों की वाह्य झिल्ली रेशेदार छिलकों से कसी होती है, जिनको मंड़ाई से भी सामान्यत:नहीं निकाला जा सकता है। इन अनाजों को मोटा अनाज कहते हैं। जैसे चना, ज्वार, बाजरा, मक्का, कोदो, मडुआ, सांवा, रागी, कुटकी, कंगनी आदि।

जरूरत : महंगाई के दौर में गरीबों की पौष्टिक भोजन की जरूरत को पूरा करने में ये सक्षम हैं। हर कोई महंगे फल और सूखे मेवे या विटामिन्स नहीं खरीद सकता। ऐसे में आर्थिक रूप से पिछड़े मोटा अनाज खाकर अपनी सेहत बना सकते हैं।

महात्म्य : देहाती भोजन समझकर जिन मोटे अनाजों को रसोई से कभी का बाहर किया जा चुका है, अब वैज्ञानिक शोध से बार-बार उनकी पौष्टिकता को प्रमाणित किया जा रहा है। तमाम बड़ी कंपनियां अब मोटे अनाजों के पैकेट बाजार में उतार रही हैं। कुलीन वर्ग इसे अब बड़े चाव से खरीदता है।

गुणों का गुणक:-– मोटे अनाज में पल्प अधिक होता है। यह आंतों में चिपकने की बजाय आसानी से आगे बढ़ता है। इससे पेट पर कब्ज का कब्जा नहीं हो पाता

– मोटे अनाज में पल्प अधिक होता है। यह आंतों में चिपकने की बजाय आसानी से आगे बढ़ता है। इससे पेट पर कब्ज का कब्जा नहीं हो पाता।

– पुराने समय में माताएं शिशुओं को ज्वार और मक्के के आटे का घोल पिलाती थीं। यह उनके लिए सुपोषक होता था।

– ज्वार, मक्का की धानी और पापड़ नाश्ते के लिए कितने फायदेमंद होते हैं, यह किसी बुजुर्ग से
पूछिए।

भेदभाव : आजादी के बाद बदली कृषि-नीति ने भारतीयों को गेहूं और चावल जैसी फसलों पर निर्भर बना दिया। इसके अलावा बाजारीकरण के बढ़ते प्रभाव से लोगों का मोटे अनाजों से मोहभंग होता चला गया। हरित क्रांति के दौर में जिस एकफसली खेती को बढ़ावा मिला उनमें धान और गेहूं को केंद्रीय भूमिका प्रदान की गई। इसका नतीजा यह हुआ कि कुल कृषि योग्य भूमि में मोटे अनाजों की पैदावार उत्तरोत्तर कम होती गई।

 जई: 

– आसानी से पच जाने वाले फाइबर के अलावा कॉम्पलेक्स कार्बोहाइडेट्स का अच्छा स्नोत ।

– लो सैच्युरेटेड फैट के साथ लेने पर हृदय संबंधी बीमारियों के खतरे को कम करता है ।

– कैल्शियम, जिंक, मैग्नीज, लोहा और विटामिन- बी व ई भरपूर मात्रा में होते हैं।

– डिसलिपिडेमिया और डायबिटीज पीड़ितों के लिए फायदेमंद ।

जौ:- 

– इस अनाज में सबसे ज्यादा अल्कोहल पाया जाता है

– यह पच जाने वाले फाइबर का भी अच्छा स्नोत है

– यह ब्लड कोलेस्ट्रोल को कम करके ब्लड ग्लूकोज को बढ़ाता है

– मैग्नीशियम का भी अच्छा स्नोत और एंटीऑक्सीडेंट है।

– अल्कोहल की प्रचुर मात्रा से यह मूत्रवर्धक का काम करता है। जिससे हाइपर टेंशन से पीड़ितों के लिए फायदेमंद।

बाजरा

– यह एक गर्म अनाज है। इसलिए आमतौर पर इसका स्वागत जाड़ों के दिनों में ही किया जाता है। बाजरा प्रोटीन का भंडार है।

– यह थायमीन अथवा विटामिन-बी का अच्छा स्नोत है और आयरन तथा कैल्शियम का भी भंडार है।

– यह उन लोगों के लिए तो बहुत ही फायदेमंद है जो गेहूं नहीं खा सकते। लेकिन बाजरे को किसी और अनाज के साथ मिलाकर खाना चाहिए।

– सामान्य गेहूं में जहां अल्प अवधि में घुन लग जाता है वहीं मडुआ का दाना दो दशक तक ज्यों का त्यों बना रहता है।

– 100 ग्राम चावल की तुलना में कंगनी 81 फीसद अधिक पौष्टिक।

– सावां में 840 फीसद ज्यादा फैट, 350 फीसद फाइबर और 1229 फीसद आयरन।

– कोदो में चावल की तुलना में 633 फीसद अधिक खनिज तत्व।

– रागी में 3340 फीसद अधिक कैल्शियम।

– बाजरा में 85 फीसद अधिक फास्फोरस। 

– काबुली चने में 23 फीसद प्रोटीन।

source: dainik jagran

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