जब अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंक कर निकल भागे थे सुभाष चंद्र बोस…!

21 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किला जाकर आजाद हिंद फौज की ‘अंतरिम सरकार’ की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर तिरंगा फहराया। उसी सभा में यह रहस्योद्घाटन किया गया कि अनेक कठिनाइयों का सामना करके नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में 21 अक्टूबर, 1943 को भारत की ‘आजाद अंतरिम सरकार’ का गठन किया था। यह महज एक संयोग था कि 1990 के दशक के दौरान मैं दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में भारत का राजदूत था। मुझे अभी भी याद है कि वर्ष 1996 में बैंकॉक में प्रवासी भारतीयों के एक प्रसिद्ध संगठन ने आजाद हिंद फौज की वर्षगांठ मनाई थी जिसमें थाईलैंड ही नहीं आसपास के अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के भारतीय राजदूतों को आमंत्रित किया गया था। इस सभा में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। इसमें ऐसे लोगों ने भाषण दिया जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सहयेागी थे। वे बहुत बूढ़े हो चले थे। परंतु उनकी स्मरण शक्ति ठीक ठाक थी। कुछ वक्ताओं ने वहां उपस्थित भारतीय समुदाय के लोगों को बताया कि किस प्रकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हृदय में भारत की आजादी का सपना पल रहा था। महात्मा गांधी के प्रति नेताजी भरपूर आदर भाव रखते थे।

परंतु उनके अहिंसक आंदोलन के वे समर्थक नहीं थे। नेताजी का मानना था कि अहिंसा का राग अलाप कर भारत को आजाद नहीं किया जा सकता था। उन्होंने अपने मन में एक योजना बनाई थी जिसके मुताबिक उन्होंने बीमार होने का स्वांग रचा था और एक दिन चुपके से कुछ मित्रों की सहायता से बीमारी का बहाना बनाकर घर से निकल गए। उनकी सुरक्षा में अंग्रेजों ने कड़ा पहरा लगा रखा था, परंतु सभी पहरेदारों की आंखों में धूल झोंककर वे निकल गए।

देश से बाहर निकल सबसे पहले वह काबुल होकर जर्मनी गए। उनको उम्मीद थी कि जर्मनी अंग्रेजों से लड़ रहा है इसलिए जर्मन सरकार उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध भारत की आजादी के लिए महत्वपूर्ण योगदान देगी। परंतु उन्हें घोर निराशा हुई जब जर्मनी की तत्कालीन हिटलर सरकार ने उन्हें भारत की आजादी के लिए कोई ठोस वादा नहीं किया। द्वितीय विश्वयुद्ध का समय था। उन्हें पता था कि जापान भी अंग्रेजों के खिलाफ जी जान से लड़ रहा है और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में अंग्रेजों को तगड़ी शिकस्त दे रहा है। बहुत चुपके से पनडुब्बियों में छिपकर वह जर्मनी से जापान आए। जापान में उनकी मुलाकात रासबिहारी बोस नाम के एक सज्जन से हुई जो मूलत: बिहार के भागलपुर के रहने वाले थे और वर्षो से जापान में रह रहे प्रवासी भारतीयों में भारत की आजादी की भावना पैदा कर रहे थे।

रासबिहारी बोस ने ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ नाम की एक संस्था का गठन किया था। बाद में इस संस्था का नेताजी सुभाष चंद्र बोस की संस्था ‘आइएनए’ या ‘आजाद हिंद फौज’ में विलय हो गया। रासबिहारी बोस ने नेताजी को जापान की सेना के तत्कालीन प्रधान ‘तोजो’ से मिलवाया था। ‘तोजो’ ने नेताजी से वादा किया था कि अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में वह भारत की भरपूर मदद करेंगे। इस सभा में वक्ताओं ने यह बताया कि नेताजी कभी सिंगापुर, कभी बैंकॉक, कभी रंगून और कभी मलाया में रहते थे। अंग्रेज उनको गिरफ्तार करने पर आमादा थे। इसलिए वे कहां हैं इसका ठीक ठीक पता नहीं लग पाता था। इस बीच भारत में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ नारा दिया कि ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’। इस भावना से प्रेरित होकर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नेताजी के आह्वान पर दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने बड़ी संख्या में ‘आइएनए’ या ‘आजाद हिंद फौज’ में अपने को भर्ती कराया। 

तय यह हुआ कि ‘आजाद हिंद फौज’ की एक बड़ी टुकड़ी बर्मा होकर असम जाएगी और वहीं से विजय पताका लहराते हुए लाल किले में तिरंगा झंडा फहराएगी। वर्ष 1945 के मध्य में ‘आइएनए’ की फौज बर्मा होते हुए असम पहुंच गई। इस सभा में शामिल हुए वक्ताओं ने यह बताया कि असम तक पहुंचने में उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। मानसून शुरू हो गया था और घने जंगलों के बीच उन्हें रात्रि में बहुत ही छिप कर जाना पड़ता था, क्योंकि अंग्रेजों के लड़ाकू हवाई जहाज उन्हें दिन रात खोज रहे थे। इस यात्रा के दौरान ‘आइएनए’ के अनेक फौजियों को सर्पदंश का शिकार होना पड़ा और बिना उपचार के वे मारे गए। जब ‘आइएनए’ की फौज असम पर कब्जा करने वाली ही थी कि खबर आई कि अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिरा दिए हैं जिस कारण जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया है। 


भारत की ओर कूच करने वाली ‘आइएनए’ की फौज की जापानी सैनिक मदद कर रहे थे। जैसे ही उन्हें यह पता चला कि जापान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में हार गए हैं, जापानी सेना भाग खड़ी हुई। आइएनए के बचे खुचे सैनिकों समेत भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। भारत में उन पर मुकदमा चला, परंतु अनेक भारतीय नेताओं ने वकीलों का चोगा पहनकर आजाद हिंद फौज के गिरफ्तार नेताओं के पक्ष में दलील दी और लाचार होकर अंग्रेजों को उन्हें रिहा करना पड़ा। आजाद हिंद फौज या आइएनए को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उन्हें पता चला कि ताइवान में एक हवाई जहाज दुर्घटना में नेताजी की मौत हो गई है।

भारत की ओर कूच करने वाली ‘आइएनए’ की फौज की जापानी सैनिक मदद कर रहे थे। जैसे ही उन्हें यह पता चला कि जापान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में हार गए हैं, जापानी सेना भाग खड़ी हुई। आइएनए के बचे खुचे सैनिकों समेत भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। भारत में उन पर मुकदमा चला, परंतु अनेक भारतीय नेताओं ने वकीलों का चोगा पहनकर आजाद हिंद फौज के गिरफ्तार नेताओं के पक्ष में दलील दी और लाचार होकर अंग्रेजों को उन्हें रिहा करना पड़ा। आजाद हिंद फौज या आइएनए को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उन्हें पता चला कि ताइवान में एक हवाई जहाज दुर्घटना में नेताजी की मौत हो गई है।

सच यह है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु कब और कैसे हुई इस रहस्य पर आज तक पर्दा पड़ा हुआ है। आजादी के बाद जितनी सरकारें आईं, किसी ने इस सच का पता लगाने का प्रयास नहीं किया। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना सही है कि पिछली सरकारों ने सुभाष चंद्र बोस के साथ न्याय नहीं किया। उचित तो यह होगा कि माध्यमिक स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में यह पढ़ाया जाए कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारत की आजादी के लिए किस तरह अपने को कुर्बान कर दिया, क्योंकि नई पीढ़ी के लिए सच जानना आवश्यक है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन वास्तव में हर भारतीय के लिए प्रेरणादायक है।

Source By: Dainik Jagran

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